MUSALMANO
KI APNI KHUD KI WAQF SAMBANDHI SAMPATTI SE HONE WALI AAMDANI KO AGAR
KEWAL MUSALMANO PAR HI IM ANDARI SE KHARCH KAR DIYA JAE TO KOI MUSALMAN
GHAREEB NAHI RAHEGA AUR USE KISI RESERVATION KI ZARURAT BHI NAHI PADEGI
MAGAR AISA NAHI HO RAHA HE, KEWAL CHAND MUSALMAN HI ISKA LUTF UTHA RAHE
HEN, KHWAJA GHAREEB NAWAZ KI DAGAH PAR HONE WALI AMAD KA BHI SAHI
HISAB-KITAB NAHI HO PATA , YEH EK BAHUT CHHOTI SI MISAL AAPKE SAMNE PESH
KI HE, AAP JANTE HEN HINDUSTAN ME KITNI BADI TADAD ME WAQF SAMPATTIYAN
HEN JISKI AMDANI KA HISAB SARKAR APNE PAS HI RAKHTI HE, TAJMAHAL ISKI
DOOSRI CHHOTI SI MISAL HE, JABKI HINDU DHARM KE LOGON KI DHARMIK
SAMPATTIYAN UNKE APNE QABZE AUR NIYANTARAN ME HEN AUR UNSE HONE WALI
AMDANI KE WOHI KHUD KAR MUKHTAR HEN. BATAO KOUN AAGE BADEGA WOH YA HUM?
PLS GHOUR KAREN AUR MUSLMANO SE NAFRAT KARNA BAND KAREN, HUM AAPKE WOH
BHAI HEN JO APNA TAN KAT KAR IS DESH KE KHAZANE ME WAQF INCOME SABHI KE
KALYAN KE LIYEN IS DESH KE KALYAN KE LIYEN SADIYON SE DETE AA RAHE
HEN.-----BY AZEEM IQBAL KHAN ADVOCATE, PRESIDENT- ALL INDIA MUSLIM
FEDERATION RAMPUR, MOBILE NO- 9027920133
हिंदुस्तान की सबसे अमीर कौम जिसकी खुद की 1.5 लाख करोड़ से अधिक की जायदाद लेकिन जी रही तंग हाल....
वक़्फ़ जायदाद की दास्तान
हालात सुधार नहीं पा रहीं 22 हज़ार जायदादें
दो हज़ार विभिन्न अदालतों में उलझीं
क़ाबिज़ों से ख़ाली कराने में असक्षम वक़्फ़ बोर्ड
जयपुर। क्या उस क़ौम की आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक स्थिति का अंदाज़ा लगाया
जा सकता है, जिसके पास 22 हज़ार संपत्तियां ऐसी हों, जिनकी आमदनी इस क़ौम
के विकास पर ख़र्च करने का शरीयत का प्रावधान हो? ये संपत्तियां पूरे
राजस्थान में वक़्फ़ जायदादें हैं। इन्हें ना बेचा जा सकता, ना ख़रीदा जा
सकता, केवल विकास किया जा सकता है और इसकी आय से क़ौम में शैक्षिक तरक़्क़ी
की जा सकती है। जबकि सच्चाई इन प्रावधानों से बिल्कुल परे है। इस 22 हज़ार
के आंकड़े से वक़्फ़ बोर्ड को मुश्किल से एक करोड़ रुपए सालाना मिलते हैं,
जो कि कर्मचारियों की तन्ख्वाह, मेंटीनेंस के लिए नाकाफी है। वजह साफ है,
यह आंकड़ा केवल कागज़ों में ही है, सच्चाई यह है कि क़रीब दो हज़ार वक़्फ़
जायदादें कई अदालतों में उलझी हैं, जिस के लिए वक़्फ़ बोर्ड पैसा व समय
खर्च कर रहा है। आम लोगों का तो इन पर क़ब्ज़ा है ही, ख़ुद सरकार के कई
दफ्तर इन जायदादों पर उन किरायेदारों की तरह क़ब्जेदार बने हुए हैं, जो ना
किराया चुकाते, न ख़ाली करते। फिर सरकार हिसाब करती है, तो ऐसे कि साढ़े तीन
प्रतिशत में चुकता कर देती है। क़ब्ज़े से ख़ाली कराने की नीयत तो है,
लेकिन इस जंजाल में इसलिए ख़ुद वक़्फ़ बोर्ड हाथ नहीं डालना चाहता कि ना
पुलिस मदद करती और ना ही प्रशासन साथ देता।
क्या है वक़्फ़ जायदाद?
****************
वक़्फ़ जायदाद वे संपत्तियां हैं, जिनके कोई मालिक नहीं या जिन्हें उसके
मालिक ने उसे अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर दिया। बुख़ारी शरीफ के अनुसार
जायदाद को इस तरह ख़ैरात (दान) कर दो कि वह ना बेची, ना ख़रीदी जा सके और
ना उसका कोई वारिस हो, बल्कि इसका फ़ायदा लोगों को मिले।
हिन्दुस्तान
में दो तरह की वक़्फ़ जायदादें पाई जाती हैं। पहली वे जायदादें हैं, जिनके
मुसलमान मालिक बंटवारे के समय, उन संपत्तियों को ख़ाली छोड़कर चले गए थे,
बाद में उनके कोई मालिक नहीं रहे। दूसरी वे जायदादें, जो किसी व्यक्ति ने
इसलिए वक़्फ़ कर दी (छोड़ दी) कि उससे शरीअत से जुड़े काम हों, लोगों की मदद
हो, मुसलमानों की शिक्षा व सामाजिक तरक़्क़ी के काम ली जा सके।
अदालतों में फंसी संपत्तियां
*******************
सुप्रीम कोर्ट- 4
हाईकोर्ट- 240
वक़्फ़ ट्रिब्यूनल- 661
सिविल कोर्ट- 57
एस्टेट ऑफिसर ऑफ वक़्फ़- 1000
कुल---------1962
63 पर सरकारी दफ्तर ही काबिज... पूरे राज्य में 63 वक़्फ़ जायदादें ऐसी
हैं, जिन पर कोई व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट काबिज नहीं, बल्कि ख़ुद सरकार के
दफ्तर क़ाबिज़ हैं। इसे ख़ुद वक़्फ़ बोर्ड की कमी कहें या कुछ और कि इनमें
केवल 34 जायदादें ऐसी हैं, जिनके किराये का आकलन किया गया है। बाकी 29
जायदादों की ना तो वक़्फ़ बोर्ड की ओर से सुध ली जाती, ना पता लगाया जा
रहा, ना ही उनकी मिल्कियत का अंदाज़ा बोर्ड को है और ना ही यह जानने की
कोशिश की जा रही कि इन संपत्तियों पर कब से कौन सा सरकारी दफ्तर क़ाबिज़ है
और उस पर अब तक कितना किराया बकाया है?
सरकार ने ही दिया लॉलीपॉप
********************
सरकारी दफ्तर इन 63 वक़्फ़ जायदादों पर उन किरायेदारों की तरह क़ाबिज़
हैं, जो ना किराया देते, ना ख़ाली करते। पिछले कुछ सालों में मुस्लिम समाज
के काफी दबाव के बाद सरकार ने इस मामले की सुध तो ली और अमली जामा पहनाया,
लेकिन बच्चों को लॉलीपॉप देकर खुश करने जैसी क्रिया कर, सरकार खुद को गंगा
नहाया समझ बैठी। दरअसल बोर्ड ने 34 ऐसी वक़्फ़ जायदादों की मिल्कियत और उन
पर क़ाबिज़ सरकारी दफ्तरों के किराए का आकलन किया, तो सरकार पर चौंकाने
वाली क़र्ज़दारी खुली। बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार यह क़र्ज़दारी क़रीब 100
करोड़ थी, जो वक़्फ़ बोर्ड के गठन से पहले से अब तक तय की गई। सरकार ने इतनी
बड़ी रक़म देने के बजाय बोर्ड को वित्तीय वर्ष 2012-13 में मात्र 3.50 करोड़
रुपए देकर पूरी क़र्ज़दारी चुकाने का दावा कर दिया। ख़ास बात यह रही कि
वक़्फ़ बोर्ड ने राज़ी ख़ुशी सरकार की इस नीयत को बाइज़्ज़त क़ुबूल भी कर
लिया। यह बात क़रीब डेढ़ दो साल पुरानी है, उसके बाद अब तक एक भी वक़्फ़
जायदादों का किराया बोर्ड के खाते में नहीं आया।
ना पुलिस का साथ, ना प्रशासन की मदद
****************************
क़रीब एक हज़ार वक़्फ़ जायदादें ऐसी हैं, जिन पर नाजायज़ तरीक़े से लोगों
ने अतिक्रमण कर रखे हैं। वक़्फ़ बोर्ड के प्रावधानों के अनुसार अतिक्रमण
साबित होने पर पुलिस व स्थानीय प्रशासन की मदद से जायदादों को ख़ाली कराया
जा सकता है, लेकिन ना पुलिस मदद करती है और ना ही प्रशासन का साथ मिलता है।
कभी कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति बताकर, तो कभी एक ही संप्रदाय का
निजी मामला समझकर, कोई दख़ल नहीं दिया जाता। ऐसे में अतिक्रमियों के हौसले
बुलंद हैं।
No comments:
Post a Comment