Wednesday, 27 February 2013

वँहा आतंकवाद नही फैलेगा तो क्या फैलेगा.

जिस देश के नेता पाखंडी हो, ब्यूरोक्रेट कपटी हो और जनता भी अपने स्वार्थ मे वोट डालती हो, उस पर एक समझदार भारतीय को आंसू ही आ सकते हैं. जरा अपने मीडिया को तो देखो, पार्टियों मे बंटकर मानो जनता को चिढाते हों. जिसे देश मे सच बोलने पर फ़ेसबुक वाले जेल मे धकेले जाते हों, वँहा आतंकवाद ही तो फैलेगा. जिस देश मे वेतनभोगी कर देता हो और करोड़ पति किसान, शेयर मार्केट से पैसा बनाने वाले बेईमान, बेनामी संपति रखने वाले ब्लैक मार्केटियर, घोटाले बाज, ये मुक्त घूमते हो, , जिस देश ने कर्नल चरस बॉर्डर से अंदर लाते हो, सरकार भीष्म पितामह की तरह बेवश है और सकुनि हर बार जुए मे जीत जाता है. प्रधान मंत्री, गृहमंत्री कितने लाचार नजर आते हैं!जरा सोचो, वँहा आतंकवाद नही फैलेगा तो क्या फैलेगा.

Mozammil Hussain

Tuesday, 26 February 2013

भारत के पास पुलिस, वकील और न्यायाधीश न सिर्फ पर्याप्त हैं, बल्कि अधिक हैं...

हमारे देश में कानून-व्यवस्था लागू न हो पाने के सबसे प्रमुख कारणों में पुलिस की कमी को बताया जाता है, जबकि सच यह है कि दुनिया के दो सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के प्रति व्यक्ति की तुलना में भारत के पास पुलिस, वकील और न्यायाधीश न सिर्फ पर्याप्त हैं, बल्कि अधिक हैं... 

मनीराम शर्मा
दारीकरण से देश में सूचना क्रांति, संचार, परिवहन, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन आम आदमी की समस्याओं में बढ़ोतरी ही हुई है. आज देश में आम नागरिक की जान-माल-सम्मान तीनों ही सुरक्षित नहीं हैं. ऊँचे लोक पदधारियों को जनता के पैसे से सरकार सुरक्षा उपलब्ध करवा देती है, जबकि पूंजीपति लोग अपनी स्वयं की ब्रिगेड रख रहे हैं.
देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60 फ़ीसदी गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं. गिरफ्तार व्यक्ति की प्रतिष्ठा की तो अपूरणीय क्षति होती ही है, साथ ही उसका परिवार भी इस दौरान उसके स्नेह, संरक्षा व सानिध्य से वंचित रहता है. गिरफ्तार व्यक्ति हिरासती यातनाएं सहने के अतिरिक्त अपने जीविकोपार्जन से वंचित रहता है, जिसका परिणाम उसके आश्रितों व परिवार को अनावश्यक भुगतना पड़ता है. 

मजोर और भ्रष्ट न्याय व्यवस्था के चलते देश में मात्र 2 प्रतिशत मामलों में दोष सिद्ध हो पाते हैं. बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में भी यह 26 फ़ीसदी से अधिक नहीं है. एक लम्बी अवधि की उत्पीड़नकारी कानूनी प्रक्रिया के बाद जब यह गिरफ्तार आम आदमी मुक्त हो जाता है तो भी उसे इस अनुचित हिरासत की अवधि के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाती. जबकि सरकारी कर्मचारियों के दोषमुक्त होने पर उन्हें सम्पूर्ण अवधि का वेतन और परिलब्धियां भुगतान की जाती हैं. हमारी यह व्यवस्था जनतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत और साम्रज्यवादी नीतियों की पोषक है.  
दिल्ली पुलिस (दंड एवं अपील) नियम, 1980 के नियम 11(1) में तो यह विधिवत प्रावधान है कि यदि एक पुलिस अधिकारी को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध कर दिया जाता है, तो भी वह अपील के निस्तारण तक सेवा में बना रहेगा. उल्लेखनीय है कि सीबीआई भी इसी नियम से शासित है और इससे लाभान्वित होती है. ऐसे भी उदाहरण हैं जहां इस नियम की आड़ में सरकार ने पुलिस अधिकारियों को अंतिम तौर पर दोषी पाए जाने के बावजूद 12 वर्षों तक सरकारी सेवा में बनाए रखा, क्योंकि इन्हीं पुलिस अधिकारियों का अनुचित उपयोग कर हमारे राजनेता सत्ता में बने हुए हैं. ऐसी स्थिति में यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि देश में लोकतंत्र है, बल्कि लोकतंत्र तो मात्र कागजों तक सिमट कर रह गया है.

मेरिका में एक अभियुक्त को “संयुक्त राज्य का अपराधी” कहा जाता है और वहां सभी आपराधिक मामले राज्य द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं. वहां भारत की तरह कोई व्यक्तिगत आपराधिक शिकायत नहीं होती. अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर 256 पुलिसवाले हैं, जबकि भारत में 130. यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुना अधिक मामले दर्ज होते हैं. इसके अनुसार भारत में प्रति लाख जनसंख्या 68 पुलिसवाले पर्याप्त हैं, किन्तु यहाँ पुलिसबल का बहुत ज्यादा वक्त विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, वसूली करने आदि में लग जाता है. अपनी बची-खुची ऊर्जा व समय का उपयोग भी पुलिस अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है.

पराधिक मामले को अमेरिका में राज्य मामला कहा जाता है और सिविल मामले को सिविल शिकायत. भारत में भी गोरे कमेटी ने वर्ष 1971 में यही सिफारिश की थी कि समस्त आपराधिक मामलों को राज्य का मामला समझा जाये, मगर उस पर आज तक कोई सार्थक कार्यवाही नहीं हो पाई है. हवाई अड्डों की सुरक्षा में तैनात पुलिस आगंतुकों के साथ जो उच्च वर्ग के होते हैं, बड़ी शालीनता से पेश आती है. वही मौक़ापरस्त पुलिस थानों में पहुंचते ही गाली-गलौच, अभद्र व्यवहार और मारपीट पर उतारू हो जाती है. वह ऐसा इसलिए करती है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान और विश्वास है कि आम आदमी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता चाहे वह किसी भी न्यायिक या गैर न्यायिक अधिकारी के पास चला जाये, कानून और व्यवस्था उसके पक्ष में ही रहेगी.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार एक वर्ष में पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के हनन के मात्र 141 मामले बताये जाते हैं, जिनमें 466 पुलिस अधिकारियों को दोष सिद्ध किया गया. वहीं एशियाई मानव अधिकार आयोग के अनुसार भारत में 9000 मामले तो सिर्फ हिरासत में मौत के हैं. इसमें अन्य मामले जोड़ दिए जाएँ तो यह आंकड़ा एक लाख को पार कर जाएगा.

यह स्थिति पुलिस की कार्यप्रणाली और तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने की सिद्धहस्तता का उत्कृष्ट नमूना है. जब आपराधिक मामलों में न्याय के लिए ऐसी पुलिस पर निर्भर रहना पड़े तो न्याय एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं हो सकता. भारतीय रिजर्व बैंक की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की समय-समय पर अचानक जांच में वे नदारद भी पाए जाते हैं, मगर उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती.

भारत में कानून और न्यायव्यवस्था की दशा में लगातार गिरावट आई है. समाज में बढती आर्थिक विषमता ने इस आग में घी डालने का काम किया है. इस स्थिति के लिए हमारे न्यायविद, पुलिस अधिकारी और राजनेता संसाधनों की कमी का हवाला देते हैं और विदेशों की स्थिति से तुलना कर गुमराह करते हैं, पर उनके इस तर्क में दम नहीं है. पश्चिमी देशों से प्रभावित महानगरीय संस्कृति को छोड़ दिया जाये तो भारत एक आध्यात्मिक चिंतन और उन्नत सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाला देश है. यहाँ लोग धर्म- कर्म और ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं.

भारत में मात्र 4.2% लोगों के पास बंदूकें हैं, जबकि हमारे पडोसी पकिस्तान में 11.6% और अमेरिका में 88.8% लोगों के पास बंदूकें हैं. इससे रक्तपात और अपराध की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है. अमेरिका में कानून, और कानून का उल्लंघन करने वालों के प्रति न्यायाधीशों का रुख सख्त रहता है, इसलिए कानून का उल्लंघन करने वालों को विश्वास है कि उन्हें न्यायालय दण्डित करेंगे. इसी कारण अपराधी लोग वहां प्राय: अपना अपराध कबूल कर लेते हैं, जिससे मामले के परीक्षण में लंबा समय नहीं लगता. ऐसी स्थिति में दंड देने में न्यायाधीशों का उदार रवैया रहता है. हालाँकि उनके पास दंड की अवधि निर्धारित करने के लिए भारत की तरह ज्यादा विवेकाधिकार नहीं होते. ऐसी व्यवस्था के चलते अमेरिका में 75% सिविल मामलों में न्यायालय में जाने से पूर्व ही समझौते हो जाते हैं.

मेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर 5806 मुकदमे दायर होते हैं, जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है. इसके अतिरिक्त अमेरिका में संघीय और राज्य कानूनों के लिए अलग अलग न्यायालय हैं. उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति बैंक का एटीएम तोड़ता है तो बैंक संघ का विषय होने के कारण संघीय न्यायालय का मामला होगा, मगर वही व्यक्ति यदि एटीएम कक्ष में किसी व्यक्ति की चोरी करता है तो यह राज्य का मामला होगा.

प्रति लाख जनसंख्या पर अमेरिका में 10.81 और भारत में 1.6 न्यायाधीश हैं. एक अनुमान के अनुसार भारत के न्यायालयों में दर्ज होने वाले मामलों में से 10 फ़ीसदी तो प्रारंभिक चरण में या तकनीकी आधार पर ही ख़ारिज कर कर दिये जाते हैं, कानूनी कार्यवाही लम्बी चलने के कारण 20 प्रतिशत मामलों में पक्षकार अथवा गवाह मर जाते हैं. 20 फ़ीसदी मामलों में पक्षकार थकहार कर राजीनामा कर लेते हैं और 20 प्रतिशत मामलों में गवाह बदल जाते हैं. यानि सिर्फ 30 फ़ीसदी मामले ही पूर्ण परीक्षण तक पहुँच पाते हैं.

स प्रकार परिश्रम और समय की लागत के दृष्टिकोण से भारत में दायर होने वाले मामलों को आधा ही माना जा सकता है. भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर दायर होने वाले मामलों की संख्या मात्र 760 आती है जो अमेरिका से लगभग 1:7 है. भारत में प्रति लाख जनसंख्या न्यायाधीशों की संख्या लगभग 1:7 ही है जो दायर होने वाले मामलों को देखते हुए किसी प्रकार से कम नहीं है.

मेरिका में न्यायालय में दिए गए वक्तव्य के लिए वकील बाध्य होता है. वह कानून या तथ्य के सम्बन्ध में झूठ नहीं बोल सकता, क्योंकि ऐसी स्थिति में दण्डित करने की शक्ति न्यायालय के ही पास है. मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति किरुबकर्ण ने हाल ही एक अवमानना मामले की सुनवाई में कहा है कि देश की जनता न्यायपालिका से पहले ही कुण्ठित है, इसलिए मात्र 10 फ़ीसदी पीड़ित लोग ही न्यायालय तक पहुंचते हैं. यह स्थिति न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है.

पूर्ण न्याय की अवधारणा में सामाजिक और आर्थिक न्याय को ध्यान में रखे बिना न्याय अपने आप में अपूर्ण है. भारत में प्रति व्यक्ति औसत आय 60000 रुपये, न्यूनतम मजदूरी 72000 रुपये और एक सत्र न्यायधीश का वेतन 720000 रुपये वार्षिक है. वहीँ अमेरिका में क्रमश: 48000, 15000 और 25000 डॉलर वार्षिक है. अमेरिका में न्यायालयों में वर्षभर में मात्र 10 छुटियाँ होती हैं, भारत में उच्चतम न्यायालय में 100, उच्च न्यायालय में 80 और अधीनस्थ न्यायालयों में 60 छुटियाँ होती है. इस दृष्टि से देखा जाये तो भारतीय न्यायाधीशों का वेतन बहुत अधिक है.

यानि भारत की जनता कानून और न्याय प्रशासन पर अपनी क्षमता से काफी अधिक धन खर्च कर रही है. इस सत्य को किसी वर्ग द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किये जाने से भी तथ्य नहीं बदल जाता. तथ्यों को देखें तो भारत में कानून और न्याय प्रशासन के मद पर होने वाला व्यय किसी प्रकार से कम नहीं है, बल्कि देश में कानून-व्यवस्था और न्याय प्रशासन कुप्रबंधित हैं. भारत में कानून, प्रक्रियाओं और अस्वस्थ परिपाटियों के जरिये जटिलताएं उत्पन्न कर न्यायमार्ग में कई बाधाएं खड़ी कर दी गयी हैं जिससे मुकदमे द्रौपदी के चीर की भांति लम्बे चलते हैं.

भारत में 121 करोड़ की आबादी के लिए 17 लाख वकील कार्यरत हैं अर्थात प्रति लाख जनसंख्या पर 141 वकील हैं और अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर 391 वकील हैं. परीक्षण पूर्ण होने वाले मामलों के साथ इसकी तुलना की जाये भारत में यह संख्या 60 तक सीमित होनी चाहिए. दूसरी ओर हमारे पड़ोसी चीन में 135 करोड़ लोगों की सेवा में मात्र 2 लाख वकील हैं.

भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर चीन से 10 गुने ज्यादा वकीलों की फ़ौज हैं जिनके पालन पोषण का दायित्व अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता पर आ जाता है. दिल्ली में तो यह आंकड़ा और भी चौंकता है. यहाँ हर तीन सौ में एक वकील है. दूसरी तरफ चीन में न्यायालयों के लिए निर्णय देने की समयसीमा निर्धारित है और इस सीमा के बाद निर्णय देने के लिए उन्हें उच्च स्तरीय न्यायालय से अनुमति लेनी पड़ती है. भारत में न्यायालय के लिए तारीख पेशी देना, जैसा कि रजिस्ट्रार जनरलों की एक मीटिंग में कहा गया था, एक 'आकर्षक धंधा' है और उससे न्यायालयों की बहुत बदनामी हो रही है.

च्चतम और उच्च न्यायालयों में मुख्यतः सरकारों के विरुद्ध मामले दर्ज होते हैं. सरकारी बचाव पक्ष अपना पक्ष सही प्रस्तुत करे तो मुकदमे आसानी से निपटाए जा सकते हैं, पर सरकारी पक्ष अक्सर सत्य से परे होते हैं इसलिए मुकदमे लम्बे चलते हैं. यदि मामला सरकार के विरुद्ध निर्णित हो जाए तो भी उसकी अनुपालना नहीं की जाती क्योंकि सरकारी अधिकारियों को विश्वास होता है कि न्यायाधीश उनके प्रति उदार हैं. इसलिए वे चाहे झूठ बोलें या अनुपालना न करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं.

च्चतम और उच्च न्यायालयों में सुनवाई के दौरान सामान्यतया साक्ष्य नहीं पेश किया जाता. मात्र बहस व शपथपत्र के आधार पर निर्णय होते हैं. इनमें लंबा समय लगने को उचित नहीं ठहराया जा सकता. फ़ास्ट ट्रेक न्यायालयों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता, जब मामले को उच्च स्तरीय न्यायालयों द्वारा स्टे कर दिया जाये और उसे फ़ास्ट ट्रैक मामला ही मानते हुए तुरंत निपटान नहीं दिया जाए. देश के प्रबुद्ध, जागरूक, जिम्मेदार और निष्ठावान नागरिकों से अपेक्षा है कि वे इस स्थिति पर मंथन कर देश में अच्छे कानून का राज पुनर्स्थापित करने में खुद को सक्रिय करें.

maniram-sharmaमनीराम शर्मा राजस्थान में वकालत करते हैं.
Last Updated on Wednesday, 27 February 2013 10:38

Atankwad virodhi “JAHIR SABHA”


All India Muslim Mahaz
“JAHIR SABHA”
Atankwad mukt bharat
Arakshan mukt azad nagar

Sabha adhyakchh Ismail Batliwala(founder all india muslim mahaz)

Mukhya atithi,
Janab Shamsher Khan Pathan (National Presidents of awami vikas party).
Dr.Tayab Patel (Presidents Maharashtra of All india united democratic front.)
Janab Rahman Azmi (Working Presidents Mumbai of Indian union muslim leuge).
Janab Ikrar Ahmed Khan (Presidents Mumbai of Peace party of india).
Dr Siraj Usmani (Convenor Mumbai of welfare party of india).
Janab Sayad Aftab Nuruddin (Presidents Maharashtra of Rashtarya ulma council).
Mufti Abdur Rahman Milli (National vice Presidents of Indian National League).
alhaj Badiuzzaman Khan (National Presidents of National Lokhind Party).
Dr Shaikh Umar (National Presidents of Indian muslim congress party).
Janab Sayad Ikramuddin (Genral Secratory of Lok vikas party).
Dr.Kamal Minai (National Presidents of Rashtrya Aman Manch).

Sunday 10 march 2013,shaam 6 baze, Azad Nagar,bhayandar,east (Mumbai).

Is sabha me aap sabhi seshamil hone ki guzarish hai.

Saturday, 23 February 2013

मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए.

मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए............ ............... ............... ............... ....
एक ही सवाल, कहाँ हूँ, कैसा हूँ, क्या कर रहा हूँ, हर सवाल का एक ही जवाब- जहां था वहीं हूँ, काम ख़त्म हो चुका मगर मैं ज़िंदा हूँ क्यों... जो कर सकता था किया, अल्लाह जो काम लेना चाहता था उसने लिया अब क्यों ज़िंदा हूँ, समझ में नहीं आता। अपने लिए कुछ रोज़ जीने की एक ज़माने से ख़ाहिश थी, कभी फ़ुर्सत ही ना मिली, शायद मौत से पहले वो ज़िंदगी तलाशकर रहा हूँ, मेरे क़लम से निकलने वाला एक एक लफ़्ज़ हर रोज़ सौ नए दुश्मन बनाता है, दोस्त बहुत हैं पर ना उनको मेरा पता मालूम, ना मुझे उनका.... पर मेरे सब दुश्मनों को मेरा पता मालूम है, तहरीक को नाकाम बनाने का तरीक़ा मालूम है, वो हर रोज़ इस पर काम करते हैं और आपजो बहुत दर्दमंद हैं वो बातें कर लेते हैं, बाक़ी इतना भी नहीं, बीस करोड़ मुसलमानों की तादाद जम्हूरी मुल्क में बहुत अहमियत रखती है, पर अपनी अहमियत खो चुके हो आप, बर्मा (म्यानमार) में हज़ारों मुसलमान क़त्ल कर दिएगए, बातें करने और अफ़सोस ज़ाहिर करने के सिवा क्या किया आपने, जिनको वोट दिया वो आप केवोट की ताक़त पर हुकूमत करते हैं, क्या मिले उनसे, क्या मजबूर किया उनको इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने के लिए, जो आपके नेता हैं, मुसलमानहैं, मालूम किया उनसे, क्या किया इस सिलसिले में। मैं लिखता क्यों नहीं, बोलता क्यों नहीं, क्या हो जाएगा मेरे लिखने और बोलने से, आप मज़लूमीन को इंसाफ़ दिलाने के लिए एक प्लेटफार्म पर खड़े हो जाऐंगे, नहीं आप ऐसा नहीं करेंगे, आसमान से तारे तोड़ कर लाने की ख़्वाहिश रखेंगे लेकिन घर की दहलीज़ पर क़दम रखना नहीं चाहेंगे, फिर क्या करेंगे, मेरा लिखा पढ़ कर या मेरी तक़रीर सुन कर, मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए, दर्द भरी दास्तान है........



Ashraf Azmi

inpar bhi likhen

sabhi saathion se guzarish hai ke niche likhe huyee mude par bhi likhen

(1)    kissan,mazdoor,karigar.Kalakar ki halat.
(2)    Mahila ki unnati kaise ho ?
(3)    samajik burayee kaise kam ho ?
(4)    bharastachar se mukti kaise mile ?
(5)    kanoon kaida,samaji na barabri kaise door ho ?
(6)    musalman taalim ko kaise apnaye ?
(7)    O.B.C.,Dalit,Adivasi ki halat?
(8)    Jal,jangal aur zameen par kaun kabza kar raha hai

adhikari aap ka kaam nahi karta hai



dosto agar koyee adhikari aap ka kaam  nahi
karta hai to uske liye ye detail mil Karen.
                                                 
(1)     D.M. ka naam address E mail,mobile no.
(2)     M.P.aur M.L.A.ka naam Email,mobile no.
(3)     Adhikari ke ghar aur office ka address.
(4)     Adhikari ka.Email id,mobile no
(5)     Aap ne jo patra vivhar kiya ho uski copy.
(6)     aimm ke naam par ek firyadi latter.
               allindiamuslimmahaz@yahoo.in  

control me nahi.



(1)  Atanwad control me nahi.
(2)   Naksalwad control me nahi.
(3)  Kattarwad control me nahi.
(4)  Danga fasad control me nahi.
(5)  Magayee control me nahi.
(6)  Desh ka border control me nahi.
(7)  Bharshtachar control me nahi.