Saturday, 9 February 2013

आतंकी को मज़हब से जोड़कर उससे हमदर्दी करना जायज़ है ?

पहले अजमल कसाब और आज अफज़ल गुरु ,चलो अच्छा हुआ एक टैन्शन ख़त्म हुई और यही सोचते -सोचते पान की दूकान पर गया जहाँ पहले से कई ग्राहक पान के इन्तजार में थे और कुछ लोग एक कोने में खड़े हुए सिगरेट के कश उड़ाते हुए अफज़ल गुरु की फाँसी पर चर्चा कर रहे थे कि अचानक मेरे मुँह से निकल गया " चलो अच्छा हुआ टेंशन ख़त्म हो गई " तभी उन लोगों में से एक ने कहा कि " जिस दिन साध्वी प्रिग्या और असीमानद नामक आतंकियों को फाँसी होगी टेन्शन तो उस रोज ख़त्म होगी " क्योंकि मेरा " गुड्डू " नाम कॉमन है और हिन्दू और मुस्लिम दोनों में ही मिल जाता है इसलिए उन साहब ने मुझे हिन्दू समझ कर ये जवाब दिया था मगर घर लौटते हुए मैं रास्ते भर यही सोचता रहा कि क्या एक आतंकी को मज़हब से जोड़कर उससे हमदर्दी करना जायज़ है मगर अब तक जवाब नहीं ढूँढ पाया हूँ

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