Monday, 30 December 2013

भारतीय संविधान की परिकल्पना लोकतंत्र

भारतीय संविधान की परिकल्पना लोकतंत्र और
मानवाधिकारों की सुरक्षा रही है. भारतीय
संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत
सभी को समानता का अधिकार दिया गया है.
अनुच्छेद-15 शैक्षणिक संस्थानों में
सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है. अनुच्छेद-16
सभी नागरिकों को सरकारी नौकरियों में
समानता का अधिकार देता है. इन
तीनों अनुच्छेदों को आधार पर
किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म, नस्ल, लिंग,
जाति, जन्म अथवा निवास स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है.
अनुच्छेद-25 के तहत सभी लोगों को अपने धर्म और
विश्वास को मानने की आजादी दी गई है. यह बेहद
ही खुशी की बात है कि संविधान के तहत कानून के
अलावा भारतीय समाज
सभी लोगों को बराबरी का दर्जा देने में यकीन करता है. इन सबके बावजूद, भारत सरकार ने कॉन्स्टीट्यूशन
(अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के पैरा-3 में एक शर्त
रखी है कि अनुच्छेद-341 के तहत अनुसूचित
जाति को मिलने वाली सुविधाएं सिर्फ हिंदू,
सिख या नव-बौद्ध (धर्मांतरित)
को ही दिया जाएगा. इस धार्मिक भेदभाव के कारण मुस्लिम और ईसाई दलित सरकारी शिक्षण
संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और अन्य मामलों में
इस अधिकार से वंचित हैं, जबकि हिंदू, सिख या नव-
बौद्ध को मानने वाले 1950 से अभी तक इनका लाभ
उठा रहे हैं. मुस्लिम और ईसाई दलितों के लिए सबसे अधिक दुख
की बात यह है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में
लोकसभा अथवा विधानसभा की सीट अनुसूचित
जाति के लिए आरक्षित कर दी गई हैं. इस कारण
मुस्लिम और ईसाई दलित उन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने
के अधिकार से वंचित हैं. वर्ष 1950 से अभी तक लोकसभा के लिए 15 बार
चुनाव हो चुके हैं, लगभग 540 सीट मुस्लिम बहुल
इलाकों में आरक्षित रखे गए और इन पर मुस्लिम
या ईसाई दलित जीत हासिल कर सकते थे. इस
नुकसान का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है
कि अबी तक 450 मुस्लिम सदस्य लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें 540 सीटों से वंचित रखा गया.
ठीक इसी तरह, जो अधिकार अनुसूचित
जाति को दिए गए हैं, अगर उन सबसे मुस्लिम और
ईसाई दलितों को वंचित नहीं रखा गया होता,
तो मुस्लिम वर्ष 1952 से अभी तक 3000 और अधिक
विधानसभा सीटें जीत सकते थे. लोकसभा और विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम और
ईसाई दलितों के प्रतिनिधित्व पर पाबंदी लगाने से
मुस्लिमों को विकास के विभिन्न क्षेत्रों से वंचित
रखा गया. राजनीतिक संस्थाओं में
मुस्लिमों ईसाइयों का कम प्रतिनिधित्व होने के
कारण अन्य क्षेत्रों में भी उनके साथ भेदभाव को बढ़ावा मिला. इस पैराग्राफ का तात्पर्य यह है कि यदि कोई हिंदू,
सिख या बौद्ध आनुसूचित जाति का व्यक्ति धर्म
परिवर्तित कर इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल
करता है, तो वह अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित
जाति को मिलने वाले तमाम सुविधाओं से वंचित
हो जाएगा. और, अगर वही व्यक्ति दोबारा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में वापस आ जाता है, तो फिर
से वह पहले के अधिकारों का उपयोग करने के योग्य
हो जाएगा. यह कहना उचित होगा कि पैरा-3 के
प्रावधान गरीब मुस्लिम और
ईसाइयों को धर्मांतरण कर हिंदू, सिख, बौद्ध धर्म
ग्रहण करने के प्रलोभन देने के लिए बनाए गए हैं. वहीं दूसरी ओर यह पैरा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के
तहत आने वाले अनुसूचित जाति के
लोगों को इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल करने के लिए
भी हतोत्साहित करता है. हमारे मुताबिक, यह
प्रावधान गरीब मुसलमानों को इस्लाम छोड़ने
का प्रलोभन देता है. सुप्रीम कोर्ट में पैरा-3 के खिलाफ वर्ष 2004 में एक
रिट याचिका दाखिल की गई. इसमें
कहा गया कि यह पैरा अनुच्छेद, 14, 15, 16 और 25 के
तहत मुस्लिम और ईसाई दलितों को दिए गए
अधिकार का उल्लंघन करता है. इस याचिका के
जवाब में हलफनामा दायर करते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2005 में रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन
किया. वर्ष 2007 में आयोग ने केंद्र सरकार
को पैरा-3 को समाप्त करने की सलाह दी,
क्योंकि ये पैरा न सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14, 15,
16 और 25 का उल्लंघन करते हैं, बल्कि यह उचित
भी नहीं हैं. हाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपने
हलफनामा में पैरा-3 को खत्म करने की मांग की.
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए राष्ट्रीय
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामा में
कहा कि मुसलमान एवं ईसाई
दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की. उनका यह भी कहना था कि इस
प्रावधान से हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से ताल्लुक
रखने वाले अनुसूचित जाति वर्ग पर कोई
नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. सुप्रीम
कोर्ट द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद केंद्र
सरकार ने अभी अपना विचार अदालत में नहीं रखा है. यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट इस
मामले में कोई फैसला देने की स्थिति में नहीं है. यह ध्यान देने वाली बात है कि लालू प्रसाद यादव
और मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल
में पैरा-3 को खत्म करने के लिए विधानसभा में
प्रस्ताव पास किया और उसे भारत सरकार
को भेजा. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय
अध्यक्ष मायावती ने दो सितंबर, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तीन पत्र लिखे
और मांग की कि किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक
को धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दी गई है, इसलिए
कॉन्स्टीट्यूशनल (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के
तहत जोड़ा गया पैराग्राफ सही नहीं है. इससे
सिर्फ हिंदू धर्म के मानने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को ही फायदा हो रहा है. पैरा-3 को खत्म
करने की सिफारिश करते हुए उन्होंने
लिखा कि इससे हिंदू धर्म के तहत आने वाले
अनुसूचित जाति के
लोगों को भी अपनी मर्जी का धर्म चुनने
की आजादी होगी. हम इसे असंवैधानिक और भारतीय संविधान में दिए
गए मौलिक अधिकार के खिलाफ अनुचित कानून
मानते हैं. यह भारतीय समजा की धर्मनिरपेक्ष
प्रकृति के खिलाफ है. इसलिए हम भारत सरकार से
इस कानून को तुरंत समाप्त करने की मांग करते हैं. इस
संदर्भ में हम सभी मतदाताओं से अपील करते हैं कि जब कोई उम्मीदवार उनसे वोट मांगने आता है,
तो उन्हें इसी शर्त में उनका समर्थन करना चाहिए
कि उम्मीदवार पैरा-3 के उन्मूलन में गंभीर प्रयास
करेंगे. जो उम्मीदवार इस धार्मिक भेदभाव के
उन्मूलन के पक्ष में नहीं हो, उन्हें यह
कहा जाना चाहिए कि वे उन्हें वोट नहीं देंगे. हम सभी संगठनों से अपील करते हैं कि इस प्रस्ताव
को प्रभावी बनाने के लिए अपने संबंधित क्षेत्र में
मतदाताओं के बीच काम करना चाहिए और उन्हें
जागरूक करना चाहिए. डॉ अनीस अंसारी, आईएएस (सेवानिवृत)

Khan Hamid Raza.

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