मित्रो!... बंदे मातरम चिल्लाना कोई राष्टप्रेम
का प्रमाणपत्र नहीं!..है वन्दे मातरम चिल्लाने वाला गद्दार भी हो सकता है
और न चिल्लाने वाला राष्ट के प्रति कर्तव्य पालन के प्रति मुस्तैद!...हमें
असल मकसद से मतलब रखना चाहिए!....आर0एस0एस0 का बँडेमातरम
के नाम पर निसमझ हिंदू नौजवानों को भड़काना असल में देश तोड़क चाल का
हिस्सा है!....हम सब को ऐसी चालों से सावधान रहना चाहियों!....भारतीय जनता
पार्टी की माँ आर0एस0एस0 जो 1925 से बनी है और उस समय सारा देश वनडेमातरम
बोल रहा था और जो बँडेमातरम नही भी बोलते थे वह भी उसी काम में अपनी जान
लूटा रहे थे , जेल जेया रहे थे, अंग्रेज पुलिस की लाठियाँ खा रहे थे तब यह
बंदे मातरम बोलने पर ज़ोर देने वाले आर0एस0एस0 के नेता और संस्थापक सब के
सब सारी बातों से अनभीगी बन सुबह होते ही आर0एस0एस0 का झंडा गाड़ कर ध्वज
प्रणाम करने में मस्त रहते थे!....कोई उस समय इन में से बँडेमातरम का नारा
बुलंद करने को आयेज क्यों नहीं आया!...ले दे कर इन लोगों के पास एक नाम
बचाता है विनायक दामोदर सावरकर का जो इनके प्रेरणा श्रोत हैं जिन्हें यह
वीर सावरकर कहते हैं!... वह अँग्रेज़ों से माई बाप कह कर लिखित माफी माँग
कर उनके लिए काम करने का वायदा कर जेल से च्छुटे थे!...और इस वात के लिए
मैं उनकियरीफ़ त करता हूँ की जो वायदा कर के अँग्रेज़ों से छ्छूते थे उसे
पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अक्षरश: निभाया!...भले ही देश के तीन
टुकड़े हो गये पर दिया हुआ वचन टुकड़े -टुकड़े नहीं होने दिया!...
अब इन्हे राष्ट्र भक्त कहो या राष्ट्र द्रोही यह मैं भारत के नौजवानों पर छ्चोड़ता हूँ!....
सारे लिखित दस्तावेज़ी सबूत हैं कोई लफ़फाज़ी नहीं कर रहा आर0एस0एस0 वालों की तरह!...इतिहास को खंगाल कर तो देखो भाई!...दूध का ढूढ़ पानी का पानी हो जायगा!....जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग बना कर अलग पाकिस्तान माँगने से तीन वर्ष पहले ही अँग्रेज़ों से किए वायदे को पूरा करने के लिए सावरकर ने द्विराशट्रवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित कर हिंदू मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते इस के लिए अलग अलग दो राष्ट्र हिंदू और मुसलमानों के होना ही चाहिए कह कर रास्ता बनाना ह्नड़ू मुस्लिम एकता को तोड़ने का तैयार कर दिया था जिसका उस समय मतलब था आज़ादी के आंदोलन की कमर तोड़ने उसकी हत्या करने जैसा और अग्रेज़ों को देश पर अपना साम्राज्य कायम रखने में सहयोग देने वाला था इस से कौन इनकार कर सकता है!...क्या हिंदू मुसलमान होना इतनी घ्रना का कारण है की हम एक साथ एक मुल्क में रह ही नहीं सकते!...फिर हिंदुओं के लिए भी इस आर0एस0एस या भाजपाई दर्शन में जगह कहाँ है यदि ऐसा होता की हिंदूओं के ही खैर ख्वाऐं ह तो फिर यह च्छुआ छ्छूट ऊँच नीच का ड्रामा क्यों होता!...कौन हिंदू है!...कोई ब्राह्मण है कोई बनियान है कोई राजपूत हैं कोई शूद्र है कोई अहीर है कोई गडरिया है कोई नाई है कोई धोबी है हिंदू कौन है!...इस लिए मेरे देश के आती उत्साही इतिहास से अनभिगी नौजवानों घ्रना की राजान्ीती को समझो और उससे वाज़ आओ!...मैनपुरी के शायर इकबाल जी की पंक्तिया आज बरबस याद आतीं हैं!... खून-ए-इंसान की प्यासी जो नज़र आतीं हो!... तोड़ दो मंदिरो मस्जिद की वह सब दीवारें!.. हम चमन में हरगिज़ नहीं बसने देंगे!... जो उठाते हों यहाँ नफ़रतों की दीवारें!... धन्यवाद मित्रो!... आपका महत्वाकांक्षी!... लाल देवेन्द्र सिंह चौहान
अब इन्हे राष्ट्र भक्त कहो या राष्ट्र द्रोही यह मैं भारत के नौजवानों पर छ्चोड़ता हूँ!....
सारे लिखित दस्तावेज़ी सबूत हैं कोई लफ़फाज़ी नहीं कर रहा आर0एस0एस0 वालों की तरह!...इतिहास को खंगाल कर तो देखो भाई!...दूध का ढूढ़ पानी का पानी हो जायगा!....जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग बना कर अलग पाकिस्तान माँगने से तीन वर्ष पहले ही अँग्रेज़ों से किए वायदे को पूरा करने के लिए सावरकर ने द्विराशट्रवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित कर हिंदू मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते इस के लिए अलग अलग दो राष्ट्र हिंदू और मुसलमानों के होना ही चाहिए कह कर रास्ता बनाना ह्नड़ू मुस्लिम एकता को तोड़ने का तैयार कर दिया था जिसका उस समय मतलब था आज़ादी के आंदोलन की कमर तोड़ने उसकी हत्या करने जैसा और अग्रेज़ों को देश पर अपना साम्राज्य कायम रखने में सहयोग देने वाला था इस से कौन इनकार कर सकता है!...क्या हिंदू मुसलमान होना इतनी घ्रना का कारण है की हम एक साथ एक मुल्क में रह ही नहीं सकते!...फिर हिंदुओं के लिए भी इस आर0एस0एस या भाजपाई दर्शन में जगह कहाँ है यदि ऐसा होता की हिंदूओं के ही खैर ख्वाऐं ह तो फिर यह च्छुआ छ्छूट ऊँच नीच का ड्रामा क्यों होता!...कौन हिंदू है!...कोई ब्राह्मण है कोई बनियान है कोई राजपूत हैं कोई शूद्र है कोई अहीर है कोई गडरिया है कोई नाई है कोई धोबी है हिंदू कौन है!...इस लिए मेरे देश के आती उत्साही इतिहास से अनभिगी नौजवानों घ्रना की राजान्ीती को समझो और उससे वाज़ आओ!...मैनपुरी के शायर इकबाल जी की पंक्तिया आज बरबस याद आतीं हैं!... खून-ए-इंसान की प्यासी जो नज़र आतीं हो!... तोड़ दो मंदिरो मस्जिद की वह सब दीवारें!.. हम चमन में हरगिज़ नहीं बसने देंगे!... जो उठाते हों यहाँ नफ़रतों की दीवारें!... धन्यवाद मित्रो!... आपका महत्वाकांक्षी!... लाल देवेन्द्र सिंह चौहान