इस दुनियाँ का अब तक का निकल कर आया सच यही है कि वही लोग और उनका धर्म आदर पाता है जो औरों का और औरों के धर्म का सम्मान करते है!..घमंड से दूर रहते है, सहनशील, और दूसरों को न्याय देने वाले, या लड़ना ही मजबूरी हो जाय तो न्याय की लड़ाई लड़ने वाले होते हैं!...अत्याचारी को कोई सम्मान नहीं देता!..सम्मान वह भाव है जो पीठ पीछे प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आए या सुनाई दे!...जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ इसलाम में घमंड, से दूर समता के धरातल पर (मसावत) के सिद्धांत पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के साथ साथ सहनशीलता और दूसरों के साथ न्याय तथा दूसरे धर्मों के सम्मान का अर्थात विद्वेष की भावना का परित्याग और अत्याचार के ,अनाचार को दूर करने के लिए आत्मरक्षा की महती आवश्यकता जब उसके अतिरिक्त कोई संभावना शेष न रह जाय युद्ध के लिए आदेशित किया गया है!... इसलाम और निफ़ायदेजी या राज सत्ता दो अलग चीज़ें है!...इसलाम को लेकर जो अत्याचार की कहानियाँ सुनने को मिलतीं हैं, वह या तो सामाजिक ताने वेन को ध्वस्त करने के लिए राजनैतिक उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से गढ़ कर फैलाई गयीं हैं,या फिर वह किसी निजी हित साधक शासक की निजी सत्ता लिप्सा का दुष्परिणाम है!..जिसका इसलाम धर्म से कोई लेना देना नहीं है!....इस्लाम में तो ऐसे किसी व्यक्ति को चाहे वह बादशाह ही क्यों न हो, सच्चा मुसलमान ही नही माना जाने की हिदायत है!...सच्चे मुसलमान जो एक आम आदमी है उसके लिए भी फ़र्ज़ तय किया गया है की भोजन से पहले चालीस घर चारो ओर (इधर-उधर) यह देख कर सुनिश्चित करे की कोई भूखा तो नहीं है!..फिर बादशाह की तो बात हीअलग है!...इसलाम अत्याचार और अन्याय की इजाज़त नहीं देता!...यदि कोई अपने निजी लाभ के लिए ऐसा उपदेश करता है तो वह खुद सच्चे मुसलमान के रूप में स्वयं को सही मायने में इसलाम से बाहर खड़ा पाता है!...मैने जो भी मोटी मोटी समझ इसलामिक विद्वानों उलमा के बीचर्चाओंार में सुनी है, उसी का सर प्रस्तुत किया है!..मैं कोई धार्मिक विशेषज्ञ या कोई खास जानकारी नहीं रखता/इसलिए यदि कुच्छ ऐसा हो जो मेरे द्वारा प्रस्तुति से अलग हो तो गुणी जन तदनुसार सुधार कर ठीक करले और मुझे क्षमा करें!..मेराकोई अन्यथा उद्देश्य नहीं है!...धन्यवाद/
•