मुल्क के कई ऐसे हिस्से हैं जहाँ हिन्दुओं और
मुसलमानों और कहीं हिन्दुओं और ईसाइयों के बीच नफरत अपने चरम पर है I
कश्मीर में मुस्लिम चरमपंथियों ने कई सालों तक हिन्दुओं के कत्ले आम किये
इसी तरह मुल्क में कई जगह हिन्दू चरमपंथियों ने मुस्लिमो और ईसाइयों
के सामूहिक नरसंहार किये जिनमे पुलिस और प्रशासन ने भी उन हिन्दू
चरमपंथियों की मदद की जैसे हाशिमपुरा ,मलियाना ,गुजरात ,कंधमाल I
मैंने कई बार भाजपा और उससे जुड़े कट्टर विचारधारा के दलों के प्रमुखों ने नेशनल टी वी पर बहस में काँग्रेस/समाजवादी को निशाना बनाते हुए ये कहते हुए सुना है कि भारत में अब हिन्दू होना भी अपराध हो गया है और हिन्दुओं को अपने देश में ही हिन्दू होने के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है और ये सब मुस्लिम तुष्टिकरण का नतीजा है यानि उनके कहने का तात्पर्य सीधे सीधे ये है कि उन पर गैर भाजपाई सरकारें धर्म के नाम पर ज़ुल्म करती हैं लेकिन इनके इन बयानों को लेकर ना तो कभी कोई टी वी पर बड़ी बहस का आयोजन होता है और ना कोई ये कहता है कि इनके ऐसे बयानों से भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही है तो फिर अगर शाहरुख खान ने अपने साथ हुए किसी धार्मिक भेदभाव पर अपनी राय ज़ाहिर कर दी तो इतना हंगामा है क्यूँ बरपा I अभी कुछ साल पहले ही शायद शबाना आजमी और इमरान हाशमी जैसे अदाकारों को मुम्बई की एक सोसाइटी ने फ़्लैट इसलिए नहीं दिया था क्योंकि वो मुसलमान थे और इसी तरह मुल्क के कई हिस्से ऐसे भी होंगे जहां मुस्लिम अपने घर या सोसाइटी में किसी हिन्दू को देखना नहीं चाहते अब अगर ऐसा कोई इन्सान जिसके साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ हो और वो उसे ज़ाहिर कर दे तो क्या ये गुनाह है और अगर गुनाह है तो फिर भारत में लोकतंत्र का मतलब किसी एक ख़ास समुदाय के लिए ही है और दुसरे समुदाय के लिए राजशाही जहाँ आप अपने साथ हुए ज़ुल्मों को बयान भी ना कर सके I
कल रात टी0वी0 पर शाहरुख मुद्दे पर बड़े बड़े विद्वानों को अपनी राय ज़ाहिर करते हुए देखा और एक बात बड़ी साफ़ तौर पर समझ में आई कि लोगों को शाहरुख खान के दिए बयान से दुख कम है बल्कि इस मामले में रहमान मालिक के बयान से दुःख ज्यादा है मगर किसी भी विद्वान को रहमान मालिक से माँफी मँगवाने की जिद करते हुए नहीं देखा बल्कि रहमान मालिक के बयान का गुस्सा शाहरुख खान पर उतारते हुए देखा और हर एक विद्वान शाहरुख खान से माँफी मंगवाने की जिद पर अड़ा हुआ दिखाई दिया I अब अगर इस पहलू को हम एक मिनट के लिए दुसरे नज़रिए से देखें तो पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में 2012 में एक हिन्दू लड़की का अपहरण हुआ था जिसमें एक मुस्लिम परिवार को नामज़द किया गया था और अपहरण की गूँज सबसे ज्यादा भारत में सुनाई दे रही थी जगह जगह बजरंग दल ,शिव सेना , अखिल भारतीय हिन्दू परिषद जैसे अन्य दलों के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे बल्कि इन प्रदर्शनों में कई जगह सरकारी गाड़ियों और एक जगह तो एक सरकारी कार्यालय में आग तक लगा दी गई थी ,सबकी एक ही माँग थी कि सिन्ध में हिन्दुओं पर हो रहे ज़ुल्मों का हिसाब भारत करे और पाकिस्तान पर आक्रमण किया जाए तो क्या ऐसे हालात में पाकिस्तान को उस लडकी के परिवार पर ये दबाव बनाना चाहिए था कि वो देश से माँफी माँगे कि उसकी वजह से पाकिस्तान की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही है या फिर पीड़ित को इन्साफ देना चाहिए था ताकि फिर किसी हिन्दू पर पाकिस्तान में ज़ुल्म ना हो ये बात में इसलिए लिख रहा हूँ कि अगर इसी बात को शाहरुख खान से जोड़कर देखें तो क्या अपने साथ हुए भेदभाव को ज़ाहिर करना जुर्म है जिसके लिए शाहरुख खान को माँफी माँगनी चाहिए या फिर कुछ ऐसे इन्तजाम किये जाएँ कि जिससे फिर किसी खान ,कुमार या अलबर्ट के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव ना हो I
M Shahid Guddu
मैंने कई बार भाजपा और उससे जुड़े कट्टर विचारधारा के दलों के प्रमुखों ने नेशनल टी वी पर बहस में काँग्रेस/समाजवादी को निशाना बनाते हुए ये कहते हुए सुना है कि भारत में अब हिन्दू होना भी अपराध हो गया है और हिन्दुओं को अपने देश में ही हिन्दू होने के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है और ये सब मुस्लिम तुष्टिकरण का नतीजा है यानि उनके कहने का तात्पर्य सीधे सीधे ये है कि उन पर गैर भाजपाई सरकारें धर्म के नाम पर ज़ुल्म करती हैं लेकिन इनके इन बयानों को लेकर ना तो कभी कोई टी वी पर बड़ी बहस का आयोजन होता है और ना कोई ये कहता है कि इनके ऐसे बयानों से भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही है तो फिर अगर शाहरुख खान ने अपने साथ हुए किसी धार्मिक भेदभाव पर अपनी राय ज़ाहिर कर दी तो इतना हंगामा है क्यूँ बरपा I अभी कुछ साल पहले ही शायद शबाना आजमी और इमरान हाशमी जैसे अदाकारों को मुम्बई की एक सोसाइटी ने फ़्लैट इसलिए नहीं दिया था क्योंकि वो मुसलमान थे और इसी तरह मुल्क के कई हिस्से ऐसे भी होंगे जहां मुस्लिम अपने घर या सोसाइटी में किसी हिन्दू को देखना नहीं चाहते अब अगर ऐसा कोई इन्सान जिसके साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ हो और वो उसे ज़ाहिर कर दे तो क्या ये गुनाह है और अगर गुनाह है तो फिर भारत में लोकतंत्र का मतलब किसी एक ख़ास समुदाय के लिए ही है और दुसरे समुदाय के लिए राजशाही जहाँ आप अपने साथ हुए ज़ुल्मों को बयान भी ना कर सके I
कल रात टी0वी0 पर शाहरुख मुद्दे पर बड़े बड़े विद्वानों को अपनी राय ज़ाहिर करते हुए देखा और एक बात बड़ी साफ़ तौर पर समझ में आई कि लोगों को शाहरुख खान के दिए बयान से दुख कम है बल्कि इस मामले में रहमान मालिक के बयान से दुःख ज्यादा है मगर किसी भी विद्वान को रहमान मालिक से माँफी मँगवाने की जिद करते हुए नहीं देखा बल्कि रहमान मालिक के बयान का गुस्सा शाहरुख खान पर उतारते हुए देखा और हर एक विद्वान शाहरुख खान से माँफी मंगवाने की जिद पर अड़ा हुआ दिखाई दिया I अब अगर इस पहलू को हम एक मिनट के लिए दुसरे नज़रिए से देखें तो पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में 2012 में एक हिन्दू लड़की का अपहरण हुआ था जिसमें एक मुस्लिम परिवार को नामज़द किया गया था और अपहरण की गूँज सबसे ज्यादा भारत में सुनाई दे रही थी जगह जगह बजरंग दल ,शिव सेना , अखिल भारतीय हिन्दू परिषद जैसे अन्य दलों के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे बल्कि इन प्रदर्शनों में कई जगह सरकारी गाड़ियों और एक जगह तो एक सरकारी कार्यालय में आग तक लगा दी गई थी ,सबकी एक ही माँग थी कि सिन्ध में हिन्दुओं पर हो रहे ज़ुल्मों का हिसाब भारत करे और पाकिस्तान पर आक्रमण किया जाए तो क्या ऐसे हालात में पाकिस्तान को उस लडकी के परिवार पर ये दबाव बनाना चाहिए था कि वो देश से माँफी माँगे कि उसकी वजह से पाकिस्तान की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही है या फिर पीड़ित को इन्साफ देना चाहिए था ताकि फिर किसी हिन्दू पर पाकिस्तान में ज़ुल्म ना हो ये बात में इसलिए लिख रहा हूँ कि अगर इसी बात को शाहरुख खान से जोड़कर देखें तो क्या अपने साथ हुए भेदभाव को ज़ाहिर करना जुर्म है जिसके लिए शाहरुख खान को माँफी माँगनी चाहिए या फिर कुछ ऐसे इन्तजाम किये जाएँ कि जिससे फिर किसी खान ,कुमार या अलबर्ट के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव ना हो I
M Shahid Guddu
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