सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा !
हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा !
ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में !
समझों वहीँ हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा !!
पर्वत वोह सबसे ऊंचा, हमसाया आसमां का !
वो संतरी हमारा, वोह पासबाँ हमारा !!
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ !
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जनां हमारा !!
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, वोह दिन है याद तुझको !
उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा !!
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना !
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा !!
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमां, सब मिट गए जहाँ से !
बाक़ी मगर है अब तक नाम-ओ-निशां हमारा !!
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी !
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़मां हमारा !!
"इकबाल" कोई महरम अपना नहीं जहाँ में !
मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा !!
हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा !
ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में !
समझों वहीँ हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा !!
पर्वत वोह सबसे ऊंचा, हमसाया आसमां का !
वो संतरी हमारा, वोह पासबाँ हमारा !!
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ !
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जनां हमारा !!
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, वोह दिन है याद तुझको !
उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा !!
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना !
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा !!
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमां, सब मिट गए जहाँ से !
बाक़ी मगर है अब तक नाम-ओ-निशां हमारा !!
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी !
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़मां हमारा !!
"इकबाल" कोई महरम अपना नहीं जहाँ में !
मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा !!
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