मुसलमानों में एकता की आवश्यकता
वास्तव में हम मुसलमानों को क्या हो गया है?। बहुत आश्चर्य की बात है कि हम सारे मुसलमान एक अल्लाह की इबादत करते हैं, एक पैग़म्बर को मानते हैं, एक ही किताब पर ईमान रखते हैं तथा सभी का क़िबला भी एक है, परन्तु हम लोगों में एकता नही है, हम लोग नाइत्तेफ़ाक़ी का शिकार हैं और हमें
एहसास भी नही है।
जब तक मुसलमानों में मिल्लत का दर्द नहीं होगा उस वक्त तक हालात बदलने वाले नहीं हैं। इसमें शक नहीं कि एकता ही वो रिश्ता है जिसमें मुसलमानों की ताकत छिपी हुई है और इसी ताकत से हम विरोधियों और इस्लाम दुश्मन ताकतों का सामना कर सकते हैं। मुसलमानों को सीसा पिलाई हुई दीवार की तरह एकजुट होना चाहिए और मज़बूत होना चाहिए। लेकिन विडम्बना ये है कि वो न जाने कितनी तरह के मतभेदों से दोचार हैं जिसके कारण उनको विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
जब देश का 15 से 30 करोड़ देवी देवताओं को मानने वाला एक समुदाय संगठित है तो क्या कारण है कि एक खुदा, एक क़ुरान और एक रसूल और एक काबा को मानने वाले मुसलमानों में बिखराव क्यों है? इसी तरह शिया आलिमे दीन मौलाना कल्बे जव्वाद ने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा था कि मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जायेगी, लेकिन साथ ही ये भी कहा था कि इस्लाम एक जिस्म की तरह रहेगा। मैं यहाँ ये भी जोड़ना चाहूँगा कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने ये भी कहा था कि इख्तेलाफे उम्मत रहमतह, मेरी उम्मत का मतभेद रहमत होगा तो इसका पूरी तरह अर्थ ये था कि कई मसलकों के बावजूद भी इस्लाम एक जिस्म व जान की तरह रहेगा। और यही बात हमारी एकता के लिए काफी है।
पिछली 14 सदियों में कई बार ऐसे मौके आये हैं कि ये महसूस होने लगा कि मिल्लत टूट और बिखर जायेगी। बहुत से ऐसे गिरोह और फिरके सामने आये जिन्होंने मिल्लत की एकता का तोड़ने की कोशिश की। अनगिनत ऐसे फितने सामने आये जिन्होंने इसको इस तरह कुतर डालने की कोशिश की, जैसे कैंची पान के पत्तों को कुतर डालती है, लेकिन मिल्लत की सामूहिक चेतना और कलमए तैय्यबा के आकर्षण ने इसे बिखरने से सुरक्षित रखा।
इतिहास इस बात का प्रमाण देता है कि इस्लाम कुबूल करने के बाद आपस में कट्टर विरोधी और दुश्मन कबीले भी एक दूसरे के खैरख्वाह हो गये थे और यही इस्लाम की देन थी कि जब इनमें से किसी को तकलीफ पहुँचती थी तो हर एक खुद को तकलीफ में महसूस करता था। ये भी इस्लाम की ही देन थी कि जब जंग के दौरान प्यास लगी तो एक दूसरे की प्यास बुझाने को सबसे पहले जानकर एक सहाबी (रज़ि.) ने अगले वाले सहाबी (रज़ि.) के लिए पानी आगे बढ़ा दिया और यूँ तीनों प्यासे शहीद हो गये। अगर इस्लाम में दाखिल होने से पहले के इतिहास पर नज़र डाली जाए, तो ये आपस में एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा नहीं करते थे, लेकिन इस्लाम कुबूल करने के बाद एक दूसरे का दुख दर्द महसूस करने लगे थे और ऐसे वक्त में जब प्यास के कारण गला सूख रहा हो और दम निकलने को है, ये उत्तम खयाल हो कि दूसरे की प्यास पहले बुझना ज़रूरी है। इस्लाम हमें एकजुट होने के लिए एक ऐसा अवसर प्रदान करता है जिसके आगे सभी करीबी रिश्तों की भी हैसियत शून्य रह जाती है। ऐसे में हमें एकता के लिए दूसरों की नसीहत लेनी पड़े तो इससे ज़्यादा अफसोस की कोई और बात नहीं होगी।
आज हम मुसलमान एकता के उस दौर को भुला बैठे हैं, इसका नतीजा ये है कि हमें ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है कि जिनके निशान देख कर हमारे सिर शर्म से झुक जाते हैं। हम दूसरे समुदायों के मुकाबले में बेहद कमज़ोर और बेवज़न साबित हो रहे हैं औऱ आपस में लड़ते हुए ही नज़र आ रहे हैं।
एकता के तमाम अवसर होने के बावजूद इस्लाम के मानने वालों की एकता बार बार टूटती क्यों है? उनके इस सवाल का जवाब शायद हमारे निजी हितों में छिपा हुआ है। हम छोटे छोटे निजी हितों के लिए मिल्लत के सामूहिक हितों की बलि चढ़ा देते हैं।
वास्तव में हम मुसलमानों को क्या हो गया है?। बहुत आश्चर्य की बात है कि हम सारे मुसलमान एक अल्लाह की इबादत करते हैं, एक पैग़म्बर को मानते हैं, एक ही किताब पर ईमान रखते हैं तथा सभी का क़िबला भी एक है, परन्तु हम लोगों में एकता नही है, हम लोग नाइत्तेफ़ाक़ी का शिकार हैं और हमें
एहसास भी नही है।
जब तक मुसलमानों में मिल्लत का दर्द नहीं होगा उस वक्त तक हालात बदलने वाले नहीं हैं। इसमें शक नहीं कि एकता ही वो रिश्ता है जिसमें मुसलमानों की ताकत छिपी हुई है और इसी ताकत से हम विरोधियों और इस्लाम दुश्मन ताकतों का सामना कर सकते हैं। मुसलमानों को सीसा पिलाई हुई दीवार की तरह एकजुट होना चाहिए और मज़बूत होना चाहिए। लेकिन विडम्बना ये है कि वो न जाने कितनी तरह के मतभेदों से दोचार हैं जिसके कारण उनको विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
जब देश का 15 से 30 करोड़ देवी देवताओं को मानने वाला एक समुदाय संगठित है तो क्या कारण है कि एक खुदा, एक क़ुरान और एक रसूल और एक काबा को मानने वाले मुसलमानों में बिखराव क्यों है? इसी तरह शिया आलिमे दीन मौलाना कल्बे जव्वाद ने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा था कि मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जायेगी, लेकिन साथ ही ये भी कहा था कि इस्लाम एक जिस्म की तरह रहेगा। मैं यहाँ ये भी जोड़ना चाहूँगा कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने ये भी कहा था कि इख्तेलाफे उम्मत रहमतह, मेरी उम्मत का मतभेद रहमत होगा तो इसका पूरी तरह अर्थ ये था कि कई मसलकों के बावजूद भी इस्लाम एक जिस्म व जान की तरह रहेगा। और यही बात हमारी एकता के लिए काफी है।
पिछली 14 सदियों में कई बार ऐसे मौके आये हैं कि ये महसूस होने लगा कि मिल्लत टूट और बिखर जायेगी। बहुत से ऐसे गिरोह और फिरके सामने आये जिन्होंने मिल्लत की एकता का तोड़ने की कोशिश की। अनगिनत ऐसे फितने सामने आये जिन्होंने इसको इस तरह कुतर डालने की कोशिश की, जैसे कैंची पान के पत्तों को कुतर डालती है, लेकिन मिल्लत की सामूहिक चेतना और कलमए तैय्यबा के आकर्षण ने इसे बिखरने से सुरक्षित रखा।
इतिहास इस बात का प्रमाण देता है कि इस्लाम कुबूल करने के बाद आपस में कट्टर विरोधी और दुश्मन कबीले भी एक दूसरे के खैरख्वाह हो गये थे और यही इस्लाम की देन थी कि जब इनमें से किसी को तकलीफ पहुँचती थी तो हर एक खुद को तकलीफ में महसूस करता था। ये भी इस्लाम की ही देन थी कि जब जंग के दौरान प्यास लगी तो एक दूसरे की प्यास बुझाने को सबसे पहले जानकर एक सहाबी (रज़ि.) ने अगले वाले सहाबी (रज़ि.) के लिए पानी आगे बढ़ा दिया और यूँ तीनों प्यासे शहीद हो गये। अगर इस्लाम में दाखिल होने से पहले के इतिहास पर नज़र डाली जाए, तो ये आपस में एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा नहीं करते थे, लेकिन इस्लाम कुबूल करने के बाद एक दूसरे का दुख दर्द महसूस करने लगे थे और ऐसे वक्त में जब प्यास के कारण गला सूख रहा हो और दम निकलने को है, ये उत्तम खयाल हो कि दूसरे की प्यास पहले बुझना ज़रूरी है। इस्लाम हमें एकजुट होने के लिए एक ऐसा अवसर प्रदान करता है जिसके आगे सभी करीबी रिश्तों की भी हैसियत शून्य रह जाती है। ऐसे में हमें एकता के लिए दूसरों की नसीहत लेनी पड़े तो इससे ज़्यादा अफसोस की कोई और बात नहीं होगी।
आज हम मुसलमान एकता के उस दौर को भुला बैठे हैं, इसका नतीजा ये है कि हमें ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है कि जिनके निशान देख कर हमारे सिर शर्म से झुक जाते हैं। हम दूसरे समुदायों के मुकाबले में बेहद कमज़ोर और बेवज़न साबित हो रहे हैं औऱ आपस में लड़ते हुए ही नज़र आ रहे हैं।
एकता के तमाम अवसर होने के बावजूद इस्लाम के मानने वालों की एकता बार बार टूटती क्यों है? उनके इस सवाल का जवाब शायद हमारे निजी हितों में छिपा हुआ है। हम छोटे छोटे निजी हितों के लिए मिल्लत के सामूहिक हितों की बलि चढ़ा देते हैं।
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