Friday, 14 December 2012

**देशभक्त' अपराधी, 'राष्ट्रवादी' आतंकी

**देशभक्त' अपराधी, 'राष्ट्रवादी' आतंकी
आखिर लेफ्टनन्ट कर्नल पुरोहित के अपराधों का साफसुथराकरण क्यों किया जा रहा है ?**
क्या हिन्दुत्व आतंक की तमाम घटनाओं के मास्टरमाइंड लेटनेन्ट कर्नल पुरोहित को अपने तमाम जनद्रोही कारनामों से बचाने की कोशि

श चल रही है ?हाल ही में अख़बारों में प्रकाशित चन्द रिपोर्टों के अंश पर गौर करें तो यही संकेत मिलता दिखता है। इन रिपोर्टों में यह कहा गया कि पुरोहित जिन आतंकी घटनाओं में मुब्तिला था, उसका मकसद अभिनव भारत जैसी आतंकी जमात में 'घुसपैठ' करना था, दबी जुबां से यह भी कहा जा रहा है कि उसने यह समूचा आपरेशन सैन्य जासूसी/मिलिटरी इंटिलिजेन्स के अपने वरिष्ठों की जानकारी में किया।

वैसे ऐसा कोईभी शख्स जिसने दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हिन्दुत्व आतंक के मामलों की छानबीन की हो वह बता सकता है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब लेफ्टनेन्ट कर्नल पुरोहित द्वारा अंजाम दिए गए आतंकी मामलों को इस किस्म की 'राष्ट्रवादी'चाशनी में परोसा जा रहा हो। इसके बारे में पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं, जिनका एक हिस्सा अभिनव भारत की मीटिंगों के रेकार्ड किए गए टेप्स हैं -जो शंकराचार्य दयानन्द पाण्डेय के लैपटाप से बरामद हुए हैं -जो इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यह शख्स इस आतंकी जमात में जासूस के तौर पर शामिल नहीं था बल्कि वह आतंकी कार्रवाइयों की अगुआई कर रहा था -संगठन के सदस्यों के साथ बैठ कर इस्त्राएल,नेपाल में अपने दूत भेजने या वहां समानान्तर सरकार गठित करने की बात चला रहा था,फण्ड इकट्ठा कर रहा था, विस्फोटकों को जमा कर रहा था,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके आनुषंगिक संगठनों के नेताओं से मुलाकातें कर रहा था। इतनाही नहीं टेप पर यह बात भी अंकित है कि किस तरह वह संघ के दो वरिष्ठ नेताओं - मोहन भागवत एवं इन्द्रेश कुमार की - हत्या की योजना बना रहा था। (देखें तहलका http://tehelka.com/story_main 46.asp? filename = Ne310710 TerrorTapes.asp½

यह भी जाहिर है कि इस समूचे मामले में सैन्य गुप्तचर/मिलिटरी इंटेलिजेन्स के कई अधिकारियों ने जैसा व्यवहार किया है, उसने निश्चितही उनका सम्मान बढ़ाना तो दूर, यही बात उजागर की है कि पुरोहित के आपराधिक कारनामों में वह भी कहीं कहीं किसी न किसी स्तर पर शामिल थे और पुरोहित को 'भेदिया' के तौर पर प्रस्तुत करके वह दरअसल इसी बात को सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जांच का दायरा इस 'मवाली'अफसर के आगे न बढ़े। यह अकारण नहीं कि इस पूरे प्रसंग में ऐसे कई बिन्दु हैं कि मालेगांव बम धमाके की जांच पर निगरानी रखनेवाले पत्राकार, संगठन या अन्य लोग यह मांग करते रहे हैं कि जांच के दायरे को पुरोहित से आगे ले जाना चाहिए। उनका मानना रहा है कि पुरोहित और अन्य अभियुक्तों की आपसी बातचीत के टेप के विवरण में जिन अन्य सेनाधिकारियों का उल्लेख है उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। फिलवक्त यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि सरकार ऐसा कोई निर्णायक फैसला ले लेगी। अगर हम पुरोहित की सैनिक कैरिअर की बात करें तो यह पाते हैं कि वह किसीभी मायने मे बहुत उल्लेखनीय नहीं थी। जम्मू कश्मीर में अपनी तैनाती के दौरान काउण्टर टेररिजम (प्रतिआतंकवादी) कार्रवाइयों में उसकी सहभागिता सामान्यसी रही। जम्मू कश्मीर में उसकी तैनाती जनवरी 2005 तक चलती रही, जहां उसका तबादला मिलिटरी इंटेलिजेन्स डाइरेक्टोरेट (सैन्य गुप्तचर निदेशालय) की काउण्टर इण्टेलिजेन्स यूनिट में हुआ। छात्राजीवन में महाराष्ट्र मिलिटरी फाउण्डेशन की गतिविधियों में उसकी सक्रियता एवं भोसला मिलिटरी स्कूल में विशेष कोचिंग क्लास में उसकी उपस्थिति ने जहां उसे हिन्दुत्व के विश्वदृष्टिकोण से प्रेरित किया था,वहीं 2005 में महाराष्ट्र में हुए उसके तबादले के बाद 'हिन्दु राष्ट्र के निर्माण'की दिशा में काम करने की उसकी सक्रियता में तेजी आयी। मिलिटरी इंटेलिजेन्स सेल में उसकी तैनाती -जिसका मकसद सेना एवं लोगों के बीच रिश्ते बढ़ाना होता है - ने अपने एजेण्डा को आगे बढ़ाने के उसके काम में सहूलियत प्रदान की। हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं के साथ वह नए सिरे से सम्बन्ध कायम कर सका, जिसमें भोसला मिलिटरी स्कूल के कमाण्डट एस एस रायकर, ने अहम भूमिका अदा की, जिसकी परिणति बाद में 'अभिनव भारत' के गठन में हुई। उसने हथियारों को चलाने के प्रशिक्षण देने के लिए शिविरों का भी आयोजन किया। उसने पुणे में भी ऐसे ही कैम्प के आयोजन हेतु पहल ली,मगर ऐसे सभी शिविर भोसला मिलिटरी स्कूल में ही आयोजित किए गए। (इण्डियन एक्स्प्रेस, 7 नवम्बर 2008) फरीदाबाद मीटिंग के दौरान पुरोहित ने बताया ''मैं जो बात कह रहा हूं उसका जिम्मा वहां बैठे आफिसर देख रहे हैं। समूचा स्कूल मेरे नियंत्रण में है। '' (26 जनवरी, बातचीत : 25)

पुरोहित को 'राष्ट्रभक्त' प्रमाणित करने की इस कहानी में कई झोल हैं।

अगर हम एक क्षण के लिए मान लें कि वाकई लेटनेन्ट कर्नल पुरोहित ने अपने वरिष्ठों को 'अभिनव भारत में अपनी घुसपैठ' के बारे में जानकारी में रखा था, तब दूसरा सवाल तत्काल उपस्थित हो जाता है कि आखिर सेना ने अपने इस अधिकारी को बिना देरी किए एटीएस को क्यों सौंपा?प्रोफेसर क्रिस्टोफ जाफरलो इसके बारे में कुछ बात कहते हैं जो गौर करनेलायक है :''..दो बातें -कमसे कम मुमकिन दिखती हैं।पहले,सेना ने पुरोहित को हिन्दुत्व आतंकी के तौर पर पेश करना बेहतर समझा क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करती तो उसे यह बात कबूल करनी पड़ती कि वह उस इलाके से गोपनीय सूचना एकत्रित कर रही है जो उसका कार्यक्षेत्र नहीं है -मध्यप्रदेश कोई जम्मू कश्मीर या उत्तरपूर्व नहीं है। अगर यह बात सही है तो सेना ने पुरोहित की कुर्बानी देना उचित समझा। दूसरी बात मुमकिन हो सकती है कि पुरोहित, जो पहले भेदिया ही रहा हो (जिसकी हमें विभिन्न बयानों के आधार पर तसदीक करनी पड़ेगी), वह खुद अभिनव भारत का हिस्सा बन गया और अमेरिकी गुप्तचर विभाग के डेविड हेडली की तर्ज पर उसने अपना पाला बदला। अभिनव भारत की मीटिंगों में पुरोहित के वक्तव्यों से यह बात अधिक अनुकूल जान पड़ती है। (मालेगांव : हू इज अबाउव द लॉ ? - क्रिस्टोफ जाफरलो, इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली, जून 30, 2012)

दिलचस्प बात है कि सेना की अदालत के तहत सम्पन्न जांच के विपरीत - जिसके प्रकाशित अंशों ने विभ्रम की स्थिति बनायी है -सेना द्वारा की गयी स्वतंत्र जांच इस बात की तसदीक करती है कि पुरोहित को कभी भी अभिनव भारत में घुसपैठ करने के लिए नहीं कहा गया था। (मालेगांव बाम्ब ब्लास्ट :पुरोहित हैड नो आडर्स टू इनफिल्टरेट अभिनव भारत फाइंडस् आर्मी प्रोब, राहुल त्रिपाठी, मनु पब्बी, इण्डियन एक्स्प्रेस, जुलाई 4, 2012) समाचार में यह भी जोड़ा गया है कि '' इस समूह के साथ उसका सम्बन्ध दरअसल सेना के सेवा नियमों को उल्लंघन था।' राष्ट्रीय जांच एजेंसी के स्त्रोतों के मुताबिक पुरोहित के दावों के विपरीत कि वह गुप्त तरीके से अभिनव भारत में घुसपैठ कर रहा था,यह बात स्पष्ट हुई है कि मामले के अन्य आरोपी स्वामी असीमानन्द के सामने उसने मिलिटरी इंटेलिजेन्स अधिकारी के तौर पर अपनी पहचान उजागर की थी।..जांचकर्ताओं का मानना है कि मालेगांव बम धामाके में साधवी प्रज्ञा और अन्य के शामिल होने के बारे में उसने जो रिपोर्ट दी थी -जो उसने उस वक्त फाइल की थी जब प्रज्ञा की भूमिका को लेकर एटीएस जांच में लगी थी, यहां तक कि उसका फोन भी सर्विलांस पर रखा गया था। यह एक तरीका था अपने आप को बचाने का क्योंकि उसे डर था कि महाराष्ट्र एटीएस द्वारा साध्वी पर सन्देह प्रगट किए जाने के बाद वह भी लपेटे में आ सकता है।

हिन्दुत्व आतंक के मामलों की जांच में हो रहे नए उद्धाटन एवं जिस तरह उसके चुनिन्दा अंश मीडिया में प्रकाशित हुए हैं उसके चलते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके आनुषंगिक संगठनों के चेहरे की मुस्कान लौट आयी दिखती है, जो विगत कुछ सालों से अपने ऊपर लगे आतंकी धाब्बे को मिटाने के लिए बदहवास दिखता है।

उनके लिए इन उद्धाटनों ने ''भारत, हिन्दुओं एवं देशभक्त लोगों के खिलाफ चल रही गहरी साजिश का खुलासा किया है। यह समूची कवायद कांग्रेस के नेताओं के एक हिस्से के इशारे पर चलायी गयी जो 'केसरिया आतंक'को प्रमाणित करने पर आमादा थे और झूठे तरीके से कुछ हिन्दु सन्तों एवं देशभक्त लोगों को आतंकी गतिविधियों में शामिल दिखाना चाहते थे। उनकी इन करतूतों से पर्दा खुल गया है।'' (आर्गनायजर, 15 जुलाई 2012)। यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि इसमें लेटनेन्ट कर्नल पुरोहित एवं शंकराचार्य दयानन्द पांडे के बारे में चन्द अच्छी बातें भी कही गयी हैं।

इस बात पर आश्चर्य होना स्वाभाविक है कि पुरोहित द्वारा अपने आप को आतंक के आरोपों से मुक्त करने के लिए जो असफल कोशिश चल रही है,उसके चलते संघ उछल रहा है। निश्चित ही संघ को लग रहा होगा कि पुरोहित द्वारा अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किए जा रहे तर्क दूरगामी तौर पर उसके लिए भी मददगार साबित होंगे। दरअसल तमाम सारे संघ के जीवनदानी प्रचारकों के आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के चलते सलाखों के पीछे चले जाने और इस मानवद्रोही षडयंत्र में 'परिवार'के कई वरिष्ठ नेताओं के नामों की चर्चा राष्ट्रीय जांच एजेंसी के फाइलों में फिलवक्त जारी रहने से, संघ को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने पर मजबूर होना पड़ा है। इस स्थिति में वह हर उस तिनके का सहारा लेना चाहता है जो उसे इससे बचा सके।

पुरोहित के लिए नए उमडे प्यार के प्रसंग ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्वकारी टीम के बारे में यह बात फिर प्रमाणित हुई है कि वह स्मृतिलोप की शिकार है अलबत्ता यह स्मृतिलोप चुनिन्दा किस्म का है (selective amnesia) । क्या वह भूल गयी कि अभी पिछले ही साल संघ सुप्रीमो के बाद नम्बर 2 पर कहे जानेवाले सरकार्यवाह सुरेश (भैयाजी) जोशी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक खत लिखा था और यह मांग की थी कि पुरोहित, दयानन्द पाण्डे आदि द्वारा मोहन भागवत एवं इन्द्रेश कुमार को मारने की जो साजिश रची गयी थी उसकी तहकीकात की जाए। 11 फरवरी 2011 को लिखा गया यह खत मीडिया के एक हिस्से में प्रकाशित भी हुआ था। इसमें लिखा गया था :

बुनियादी सवाल यह उठता है, जिसे सम्बोधित नहीं किया गया है कि आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उन लोगों के साथ नत्थी क्यों किया जा रहा है जो उसके प्रति वैरभाव रखते हैं और उसके नेताओं को मारने की साजिश रचते हैं ? .. हमारा मानना है कि कर्नल पुरोहित की भूमिका राजनीतिक थी और वह महज अपने स्तर पर काम नहीं कर रहा था। संघ को बांटने और उसके मित्र संगठनों को अन्दर से तोड़ने की उसकी कोशिशों के पीछे आखिर किसका हाथ था, इसकी जांच होनी चाहिए। महज आपराधिक जांच के जरिए इस व्यापक राजनीतिक षडयंत्र का खुलासा नहीं हो सकता। मालेगांव बम धमाके में सामने आए सबूत इस बात को स्पष्ट करते हैं कि कर्नल पुरोहित संघ एवं भाजपा के खिलाफ था। इसी के चलते उसके छिपे राजनीतिक सम्बन्धों और एजेण्डा पर सवाल उठता है। यह कहना नाकाफी है कि ऐसी रणनीतियों से जिनको राजनीतिक तौर पर लाभ होता वही इसके पीछे थे। उसके राजनीतिक एजेण्डा एवं सम्बन्धों की एक समग्र एवं व्यापक जांच के जरिए ही यह बात होना जरूरी है। दयानन्द पाण्डे के बारे में भी इसी किस्म की जांच आवश्यक है,जिसकी भूमिका भी उतनीही रहस्यमयी है। वर्ना असली सच्चाई दफन रह जाएगी। (http:\\rssonnet.org\index. php? option = com_content&task=view&id=151)

वैसे कोई साधारण शख्स भी जनाब मोहन भागवत या सुरेश जोशी से यह पूछना चाहेगा कि क्या उन्हें 'संघ एवं भाजपा के खिलाफ' खड़े पुरोहित को लेकर प्रधानमंत्री से आवश्यक जवाब मिल गया है कि अब वे इस आतंकी के लब्जों को अन्तिम सत्य मानने को तैयार हो उठे हैं। आखिर ''उसके प्रति वैरभाव रखनेवाले'और 'उसके नेताओं को मारने की साजिश' रचनेवालों के प्रति और 'संघ को बांटने और उसके मित्रा संगठनों को अन्दर से तोड़ने की' कोशिशों में मुब्तिला लोगों के प्रति संघ के नए उमडे प्यार का राज़ क्या है ?

क्या यह कहना अनुचित होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं लेटनेन्ट कर्नल पुरोहित के बीच प्यार-तकरार का यह बॉलीवुडनुमा नाटक एक तरह से एक मराठी कहावत को सही साबित करता दिखता है,जो कहती है 'एक बिल्ली आंख मूंद कर दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है।'

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